श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.26

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहुमहावीरहिरण्यरेतोघृतपृष्ठसवनमेधातिथिवीतिहोत्रकवय इति सर्व एवाग्‍निनामानः॥ २५॥ एतेषां कविर्महावीरः सवन इति त्रय आसन्‍नूर्ध्वरेतसस्त आत्मविद्यायामर्भभावादारभ्य कृतपरिचयाः पारमहंस्यमेवाश्रममभजन्॥ २६॥ तस्मिन्‍नु ह वा उपशमशीलाः परमर्षयः सकलजीवनिकायावासस्य भगवतो वासुदेवस्य भीतानां शरणभूतस्य श्रीमच्चरणारविन्दाविरतस्मरणाविगलितपरमभक्तियोगानुभावेन परिभावितान्तर्हृदयाधिगते भगवति सर्वेषां भूतानामात्मभूते प्रत्यगात्मन्येवात्मनस्तादात्म्यमविशेषेण समीयुः॥ २७॥ अन्यस्यामपि जायायां त्रयः पुत्रा आसन्‍नुत्तमस्तामसो रैवत इति मन्वन्तराधिपतयः॥ २८॥

eteṣāṃ kavirmahāvīraḥ savana iti traya āsannūrdhvaretasasta ātmavidyāyāmarbhabhāvādārabhya kṛtaparicayāḥ pāramahaṃsyamevāśramamabhajan|| 26||

अर्थ

इनमें कवि, महावीर और सवन—ये तीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए। इन्होंने बाल्यावस्थासे आत्मविद्याका अभ्यास करते हुए अन्तमें संन्यासाश्रम ही स्वीकार किया॥ २६॥

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