श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.31

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यावदवभासयति४ सुरगिरिमनुपरिक्रामन् भगवानादित्यो वसुधातलमर्धेनैव तपत्यर्धेनावच्छादयति तदा हि भगवदुपासनोपचितातिपुरुषप्रभावस्तदनभिनन्दन् समजवेन रथेन ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिनं करिष्यामीति सप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रामद् द्वितीय इव पतङ्गः॥ ३०॥ ये वा उ ह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखातास्ते सप्त५ सिन्धव आसन् यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपाः॥ ३१॥✎ 927 928

ye vā u ha tadrathacaraṇanemikṛtaparikhātāste sapta sindhava āsan yata eva kṛtāḥ sapta bhuvo dvīpāḥ|| 31||

अर्थ

उस समय इनके रथके पहियोंसे जो लीकें बनीं, वे ही सात समुद्र हुए; उनसे पृथ्वीमें सात द्वीप हो गये॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—यदेवाभासयति।

    (मुद्रित पृष्ठ 580)
  2. ५

    प्रा० पा०—सप्त सप्त सिन्ध०।

    (मुद्रित पृष्ठ 580)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #927 शब्दोंके बीचका स्थान: द्वीपा:॥३१॥ → द्वीपाः॥ ३१॥
  • #928 शब्दोंके बीचका स्थान: रथेनज्योतिर्मयेन → रथेन ज्योतिर्मयेन

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