श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यर्हि वाव ह राजन् स राजपुत्रः प्रियव्रतः परमभागवतो नारदस्य चरणोपसेवयाञ्जसावगतपरमा१र्थसतत्त्वो ब्रह्मसत्रेण दीक्षिष्यमाणोऽवनितलपरिपालनायाम्नातप्रवर२गुणगणैकान्तभाजनतया स्वपित्रोपामन्त्रितो भगवति वासुदेव एवाव्यवधानसमाधियोगेन समावेशितसकलकारकक्रियाकलापो नैवा३भ्यनन्दद्यद्यपि तदप्रत्याम्नातव्यं तदधिकरण आत्मनोऽन्यस्मादसतोऽपि पराभवमन्वीक्षमाणः॥ ६॥

yarhi vāva ha rājan sa rājaputraḥ priyavrataḥ paramabhāgavato nāradasya caraṇopasevayāñjasāvagataparamārthasatattvo brahmasatreṇa dīkṣiṣyamāṇo'vanitalaparipālanāyāmnātapravaraguṇagaṇaikāntabhājanatayā svapitropāmantrito bhagavati vāsudeva evāvyavadhānasamādhiyogena samāveśitasakalakārakakriyākalāpo naivābhyanandadyadyapi tadapratyāmnātavyaṃ tadadhikaraṇa ātmano'nyasmādasato'pi parābhavamanvīkṣamāṇaḥ|| 6||

अर्थ

राजन्! राजकुमार प्रियव्रत बड़े भगवद्भक्त थे, श्रीनारदजीके चरणोंकी सेवा करनेसे उन्हें सहजमें ही परमार्थतत्त्वका बोध हो गया था। वे ब्रह्मसत्रकी दीक्षा—निरन्तर ब्रह्माभ्यासमें जीवन बितानेका नियम लेनेवाले ही थे कि उसी समय उनके पिता स्वायम्भुव मनुने उन्हें पृथ्वीपालनके लिये शास्त्रमें बताये हुए सभी श्रेष्ठ गुणोंसे पूर्णतया सम्पन्‍न देख राज्यशासनके लिये आज्ञा दी। किन्तु प्रियव्रत अखण्ड समाधियोगके द्वारा अपनी सारी इन्द्रियों और क्रियाओंको भगवान् वासुदेवके चरणोंमें ही समर्पण कर चुके थे। अतः पिताकी आज्ञा किसी प्रकार उल्लंघन करनेयोग्य न होनेपर भी, यह सोचकर कि राज्याधिकार पाकर मेरा आत्मस्वरूप स्त्री-पुत्रादि असत् प्रपंचसे आच्छादित हो जायगा—राज्य और कुटुम्बकी चिन्तामें फँसकर मैं परमार्थतत्त्वको प्रायः भूल जाऊँगा, उन्होंने उसे स्वीकार न किया॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परमात्मतत्त्वो।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  2. २

    प्रा० पा०—प्रवरगुणैकान्त।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  3. ३

    प्रा० पा०—न वाभ्यनन्दद्यदपि तदप्रत्याम्नातं।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)

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