श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सा मां स्मृतिर्मृगदेहेऽपि वीर

कृष्णार्चनप्रभवा नो जहाति।

अथो अहं जनसङ्गादसङ्गो

विशङ्कमानोऽविवृतश्‍चरामि ॥ १५

sā māṃ smṛtirmṛgadehe'pi vīra

kṛṣṇārcanaprabhavā no jahāti|

atho ahaṃ janasaṅgādasaṅgo

viśaṅkamāno'vivṛtaścarāmi || 15

अर्थ

किन्तु भगवान् श्रीकृष्णकी आराधनाके प्रभावसे उस मृगयोनिमें भी मेरी पूर्वजन्मकी स्मृति लुप्त नहीं हुई। इसीसे अब मैं जनसंसर्गसे डरकर सर्वदा असंगभावसे गुप्तरूपसे ही विचरता रहता हूँ॥ १५॥✎ 449 450

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #449 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #450 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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