श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यदाह योगेश्‍वर दृश्यमानं

क्रियाफलं सद‍्व्यवहारमूलम्।

न ह्यञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय

भवानमुष्मिन् भ्रमते मनो मे॥ ४

yadāha yogeśvara dṛśyamānaṃ

kriyāphalaṃ sadvyavahāramūlam|

na hyañjasā tattvavimarśanāya

bhavānamuṣmin bhramate mano me|| 4

अर्थ

योगेश्‍वर! आपने जो यह कहा कि भार उठानेकी क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होनेपर भी केवल व्यवहारमूलके ही हैं, वास्तवमें सत्य नहीं है—वे तत्त्वविचारके सामने कुछ भी नहीं ठहरते—सो इस विषयमें मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथनका मर्म मेरी समझमें नहीं आ रहा है॥ ४॥

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