श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा

ममेति सर्वे भुवि बद्धवैराः।

मृधे शयीरन्‍न तु तद्व्रजन्ति

यन्‍न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति॥ १५

manasvino nirjitadiggajendrā

mameti sarve bhuvi baddhavairāḥ|

mṛdhe śayīranna tu tadvrajanti

yannyastadaṇḍo gatavairo'bhiyāti|| 15

अर्थ

जिन्होंने बड़े-बड़े दिक्पालोंको जीत लिया है, वे धीर-वीर पुरुष भी पृथ्वीमें ‘यह मेरी है’ ऐसा अभिमान करके आपसमें वैर ठानकर संग्रामभूमिमें जूझ जाते हैं। तो भी उन्हें भगवान् विष्णुका वह अविनाशी पद नहीं मिलता, जो वैरहीन परमहंसोंको प्राप्त होता है॥ १५॥✎ 451

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #451 शब्दोंके बीचका स्थान: है,वे → है, वे

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