श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

भवाटवीका स्पष्टीकरण

स होवाच

य एष देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुणविशेषविकल्पितकुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविधदेहावलिभिर्वियोगसंयोगाद्यनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन्दुर्गाध्ववदसुगमेऽध्वन्यापतित ईश्‍वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपश१मनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवीमवरुन्धे यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते॥ १॥

ya eṣa dehātmamānināṃ sattvādiguṇaviśeṣavikalpitakuśalākuśalasamavahāravinirmitavividhadehāvalibhirviyogasaṃyogādyanādisaṃsārānubhavasya dvārabhūtena ṣaḍindriyavargeṇa tasmindurgādhvavadasugame'dhvanyāpatita īśvarasya bhagavato viṣṇorvaśavartinyā māyayā jīvaloko'yaṃ yathā vaṇiksārtho'rthaparaḥ svadehaniṣpāditakarmānubhavaḥ śmaśānavadaśivatamāyāṃ saṃsārāṭavyāṃ gato nādyāpi viphalabahupratiyogehastattāpopaśamanīṃ harigurucaraṇāravindamadhukarānupadavīmavarundhe yasyāmu ha vā ete ṣaḍindriyanāmānaḥ karmaṇā dasyava eva te|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! देहाभिमानी जीवोंके द्वारा सत्त्वादि गुणोंके भेदसे शुभ, अशुभ और मिश्र—तीन प्रकारके कर्म होते रहते हैं। उन कर्मोंके द्वारा ही निर्मित नाना प्रकारके शरीरोंके साथ होनेवाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीवको प्राप्त होता है, उसके अनुभवके छः द्वार हैं—मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनसे विवश होकर यह जीवसमूह मार्ग भूलकर भयंकर वनमें भटकते हुए धनके लोभी बनिजारोंके समान परमसमर्थ भगवान् विष्णुके आश्रित रहनेवाली मायाकी प्रेरणासे बीहड़ वनके समान दुर्गम मार्गमें पड़कर संसार-वनमें जा पहुँचता है। यह वन श्मशानके समान अत्यन्त अशुभ है। इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीरसे किये हुए कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेकों विघ्नोंके कारण उसे अपने व्यापारमें सफलता भी नहीं मिलती; तो भी यह उसके श्रमको शान्त करनेवाले श्रीहरि एवं गुरुदेवके चरणारविन्द-मकरन्द-मधुके रसिक भक्त-भ्रमरोंके मार्गका अनुसरण नहीं करता। इस संसार-वनमें मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मोंकी दृष्टिसे डाकुओंके समान हैं॥ १॥✎ 1994

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—पोपशमनां।

    (मुद्रित पृष्ठ 630)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1994 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवसूह → जीवसमूह

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