कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणोंको हर लेता है, तो यह मरे हुएके समान निर्जीव हो जाता है॥ १६॥
क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसाऽपहृतप्रियतमधनासुःप्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते॥ १६॥
कभी कालके समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणोंको हर लेता है, तो यह मरे हुएके समान निर्जीव हो जाता है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 633) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/16/