श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥ क्‍वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्‍निव सीदति॥ १८॥ क्‍वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः३ स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥ स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥✎ 943

kvacid gṛhāśramakarmacodanātibharagirimārurukṣamāṇo lokavyasanakarṣitamanāḥ kaṇṭakaśarkarākṣetraṃ praviśanniva sīdati|| 18||

अर्थ

गृहस्थाश्रमके लिये जिस कर्मविधिका महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वतकी कड़ी चढ़ाईके समान ही है। लोगोंको उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करनेका प्रयत्न करता है, तब तरह-तरहकी कठिनाइयोंसे क्लेशित होकर काँटे और कंकड़ोंसे भरी भूमिमें पहुँचे हुए व्यक्तिके समान दुःखी हो जाता है॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।

    (मुद्रित पृष्ठ 633)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #943 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥१७॥ → स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥

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