श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.22

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कदाचिद् भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकैरलब्धनिद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानुक्षीयमाणविज्ञानोऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति॥ २१॥ कर्हि स्म चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये॥ २२॥ अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्‍नात्मनः संसारावपनमुदाहरन्ति॥ २३॥ मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थितिः॥ २४॥ क्‍वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविकभौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते॥ २५॥

karhi sma citkāmamadhulavān vicinvan yadā paradāraparadravyāṇyavarundhāno rājñā svāmibhirvā nihataḥ patatyapāre niraye|| 22||

अर्थ

कभी विषयसुखरूप मधुकणोंको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब यह लुक-छिपकर परस्त्री या परधनको उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजाके हाथसे मारा जाकर ऐसे नरकमें जा गिरता है जिसका ओर-छोर नहीं है॥ २२॥✎ 1955

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1955 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ढूँढते-ढूँढते → ढूँढ़ते-ढूँढ़ते

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