श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.30

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कदाचिदीश्‍वरस्य भगवतो विष्णोश्‍चक्रात्परमाण्वादिद्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्‍वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते॥ २९॥ यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरु वञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादिश्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथावानर जातेः॥ ३०॥ तत्रापि निरवरोधः स्वैरेण विहरन्‍नतिकृपणबुद्धिरन्योन्यमुखनिरीक्षणादिना ग्राम्यकर्मणैव विस्मृतकालावधिः॥ ३१॥✎ 1055

yadā pākhaṇḍibhirātmavañcitaistairuru vañcito brahmakulaṃ samāvasaṃsteṣāṃ śīlamupanayanādiśrautasmārtakarmānuṣṭhānena bhagavato yajñapuruṣasyārādhanameva tadarocayan śūdrakulaṃ bhajate nigamācāre'śuddhito yasya mithunībhāvaḥ kuṭumbabharaṇaṃ yathāvānara jāteḥ|| 30||

अर्थ

ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखेमें हैं; जब यह भी उनकी ठगाईमें आकर दुःखी होता है, तब ब्राह्मणोंकी शरण लेता है। किन्तु उपनयन-संस्कारके अनन्तर श्रौत-स्मार्तकर्मोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचारके अनुकूल अपनेमें शुद्धि न होनेके कारण यह कर्मशून्य शूद्रकुलमें प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरोंके समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है॥ ३०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1055 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंञ्च‌ितो → वञ्चितो

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