श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तत्र च क्‍वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुपः॥ ६॥ क्‍वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्सत्यग्‍निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम्॥ ७॥ अथ कदाचिन्‍निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति॥ ८॥ क्‍वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादोरजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति॥ ९॥ क्‍वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति॥ १०॥ क्‍वचि दुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं१ प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेनातिव्यथितकर्णमूलहृदयः॥ ११॥

kvacicca vātyaupamyayā pramadayā''rohamāropitastatkālarajasā rajanībhūta ivāsādhumaryādorajasvalākṣo'pi digdevatā atirajasvalamatirna vijānāti|| 9||

अर्थ

कभी बवंडरके समान आँखोंमें धूल झोंक देनेवाली स्त्री गोदमें बैठा लेती है, तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषोंकी मर्यादाका भी विचार नहीं करता। उस समय नेत्रोंमें रजोगुणकी धूल भर जानेसे बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मोंके साक्षी दिशाओंके देवताओंको भी भुला देता है॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परुषसंरभसाटोपं प्रत्यक्षं वा रिपुराज०।

    (मुद्रित पृष्ठ 632)

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