श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यमभ्यषिञ्चन् परया मुदा सतीः

सत्याशिषो दक्षकन्याः सरिद्भिः।

यस्य प्रजानां दुदुहे धराऽऽशिषो

निराशिषो गुणवत्सस्नुतोधाः॥ १०

yamabhyaṣiñcan parayā mudā satīḥ

satyāśiṣo dakṣakanyāḥ saridbhiḥ|

yasya prajānāṃ duduhe dharā''śiṣo

nirāśiṣo guṇavatsasnutodhāḥ|| 10

अर्थ

सत्यसंकल्पवाली परम साध्वी श्रद्धा, मैत्री और दया आदि दक्षकन्याओंने गंगा आदि नदियोंके सहित बड़ी प्रसन्‍नतासे उनका अभिषेक किया था तथा उनकी इच्छा न होनेपर भी वसुन्धराने गौ जिस प्रकार बछड़ेके स्नेहसे पिन्हाकर दूध देती है, उसी प्रकार उनके गुणोंपर रीझकर प्रजाको धन-रत्नादि सभी अभीष्ट पदार्थ दिये थे॥ १०॥✎ 453 454

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #453 शब्दोंके बीचका स्थान: थे,तथा → थे, तथा
  • #454 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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