॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.15.10
यमभ्यषिञ्चन् परया मुदा सतीः
सत्याशिषो दक्षकन्याः सरिद्भिः।
यस्य प्रजानां दुदुहे धराऽऽशिषो
निराशिषो गुणवत्सस्नुतोधाः॥ १०
yamabhyaṣiñcan parayā mudā satīḥ
satyāśiṣo dakṣakanyāḥ saridbhiḥ|
yasya prajānāṃ duduhe dharā''śiṣo
nirāśiṣo guṇavatsasnutodhāḥ|| 10
अर्थ
सत्यसंकल्पवाली परम साध्वी श्रद्धा, मैत्री और दया आदि दक्षकन्याओंने गंगा आदि नदियोंके सहित बड़ी प्रसन्नतासे उनका अभिषेक किया था तथा उनकी इच्छा न होनेपर भी वसुन्धराने गौ जिस प्रकार बछड़ेके स्नेहसे पिन्हाकर दूध देती है, उसी प्रकार उनके गुणोंपर रीझकर प्रजाको धन-रत्नादि सभी अभीष्ट पदार्थ दिये थे॥ १०॥✎ 453 454