श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.15.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

भरतस्यात्मजः सुमतिर्नामाभिहितो यमु ह वाव केचित्पाखण्डिन ऋषभपदवीमनुवर्तमानं चानार्या अवेदसमाम्नातां देवतां स्वमनीषया पापीयस्या कलौ कल्पयिष्यन्ति॥ १॥ तस्माद् वृद्धसेनायां देवताजिन्‍नाम पुत्रोऽभवत्॥ २॥ अथासुर्यां तत्तनयो देवद्युम्नस्ततो धेनुमत्यां सुतः परमेष्ठी तस्य सुवर्चलायां प्रतीह उपजातः॥ ३॥ य आत्मविद्यामाख्याय स्वयं संशुद्धो महापुरुषमनुसस्मार॥ ४॥ प्रतीहात्सुवर्चलायां प्रतिहर्त्रादयस्त्रय आसन्‍निज्याकोविदाः सूनवः प्रतिहर्तुः स्तुत्यामजभूमानावजनिषाताम्॥ ५॥ भूम्न ऋषिकुल्यायामुद्गीथस्ततः प्रस्तावो देवकुल्यायां प्रस्तावान्‍नियुत्सायां हृदयज आसीद्विभुर्विभो रत्यां च पृथुषेणस्तस्मान्‍नक्त आकूत्यां जज्ञे नक्ताद् द्रुतिपुत्रो गयो राजर्षिप्रवर उदारश्रवा अजायत साक्षाद्भगवतो विष्णोर्जगद्रिरक्षिषया गृहीतसत्त्वस्य कलाऽऽत्मवत्त्वादिलक्षणेन महापुरुषतां प्राप्तः॥ ६॥ स वै स्वधर्मेण प्रजापालनपोषणप्रीणनोपलालनानुशासनलक्षणेनेज्यादिना च भगवति महापुरुषे परावरे ब्रह्मणि सर्वात्मनार्पितपरमार्थलक्षणेन ब्रह्मविच्चरणानुसेवयाऽऽपादितभगवद्भक्तियोगेन चाभीक्ष्णशः परिभावितातिशुद्धमतिरुपरतानात्म्य आत्मनि स्वयमुपलभ्यमानब्रह्मात्मानुभवोऽपि निरभिमान एवावनिमजूगुपत्॥ ७॥✎ 945

tasmād vṛddhasenāyāṃ devatājinnāma putro'bhavat|| 2||

अर्थ

उसकी पत्‍नी वृद्धसेनासे देवताजित् नामक पुत्र हुआ॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #945 शब्दोंके बीचका स्थान: स्तुत्यामजभूमानावजनिषाताम्॥५॥ → स्तुत्यामजभूमानावजनिषाताम्॥ ५॥

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