श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.15

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालय इति प्रागायता यथा नीलादयोऽयुतयोजनोत्सेधा हरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथासंख्यम्॥ ९॥ तथैवेलावृतमपरेण पूर्वेण च माल्यवद्गन्धमादनावानीलनिषधायतौ द्विसहस्रं पप्रथतुः केतुमालभद्राश्‍वयोः सीमानं विदधाते॥ १०॥ मन्दरो मेरुमन्दरः सुपार्श्वः कुमुद इत्ययुतयोजनविस्तारोन्‍नाहा मेरोश्‍चतुर्दिशमवष्टम्भगिरय उपक्लृप्ताः॥ ११॥ चतुर्ष्वेतेषु चूतजम्बूकदम्बन्यग्रोधाश्‍चत्वारः पादपप्रवराः पर्वतकेतव इवाधिसहस्रयोजनोन्‍नाहास्तावद् विटपविततयः शतयोजनपरिणाहाः॥ १२॥ ह्रदाश्‍चत्वारः पयोमध्विक्षुरसमृष्टजला यद् उपस्पर्शिन उपदेवगणा योगैश्‍वर्याणि स्वाभाविकानि भरतर्षभ धारयन्ति॥ १३॥ देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चैत्ररथं वैभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति॥ १४॥ येष्वमरपरिवृढाः सह सुरललनाललामयूथपतय उपदेवगणैरुपगीयमानमहिमानः किल विहरन्ति॥ १५॥

yeṣvamaraparivṛḍhāḥ saha suralalanālalāmayūthapataya upadevagaṇairupagīyamānamahimānaḥ kila viharanti|| 15||

अर्थ

इनमें प्रधान-प्रधान देवगण अनेकों सुरसुन्दरियोंके नायक बनकर साथ-साथ विहार करते हैं। उस समय गन्धर्वादि उपदेवगण इनकी महिमाका बखान किया करते हैं॥ १५॥

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