श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यस्तु महाकदम्बः सुपार्श्वनिरूढो यास्तस्य कोटरेभ्यो विनिःसृताः पञ्चायामपरिणाहाः पञ्च मधुधाराः सुपार्श्वशिखरात्पतन्त्योऽपरेणात्मानमिलावृतमनुमोदयन्ति१॥ २२॥ या२ ह्युपयुञ्जानानां मुखनिर्वासितो३ वायुः समन्ताच्छतयोजनमनुवासयति॥ २३॥✎ 1887

yā hyupayuñjānānāṃ mukhanirvāsito vāyuḥ samantācchatayojanamanuvāsayati|| 23||

अर्थ

जो लोग इनका मधुपान करते हैं, उनके मुखसे निकली हुई वायु अपने चारों ओर सौ-सौ योजनतक इसकी महक फैला देती है॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मनुमादयन्ति।

    (मुद्रित पृष्ठ 643)
  2. २

    प्रा० पा०—यो ह्युप।

    (मुद्रित पृष्ठ 643)
  3. ३

    प्रा० पा०—मुखनिःश्‍वसितो।

    (मुद्रित पृष्ठ 643)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1887 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुपार्श्वनिरूढे → सुपार्श्वनिरूढो

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