श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न वै महाराज भगवतो मायागुणविभूतेः काष्ठां मनसा वचसा वाधिगन्तुमलं विबुधायुषापि पुरुषस्तस्मात्प्राधान्येनैव भूगोलकविशेषं नामरूपमानलक्षणतो व्याख्यास्यामः॥ ४॥ यो वायं द्वीपः कुवलयकमलकोशाभ्यन्तरकोशो नियुतयोजनविशालः समवर्तुलो यथा पुष्करपत्रम्॥ ५॥ यस्मिन्‍नव वर्षाणि नवयोजनसहस्रायामानि अष्टभिर्मर्यादागिरिभिः सुविभक्तानि भवन्ति॥ ६॥ एषां मध्ये इलावृतं नामाभ्यन्तरवर्षं यस्य नाभ्यामवस्थितः सर्वतः सौवर्णः कुलगिरिराजो मेरुर्द्वीपायामसमुन्‍नाहः कर्णिकाभूतः कुवलयकमलस्य मूर्धनि द्वात्रिंशत् सहस्रयोजनविततो मूले षोडशसहस्रं तावतान्तर्भूम्यां प्रविष्टः॥ ७॥

na vai mahārāja bhagavato māyāguṇavibhūteḥ kāṣṭhāṃ manasā vacasā vādhigantumalaṃ vibudhāyuṣāpi puruṣastasmātprādhānyenaiva bhūgolakaviśeṣaṃ nāmarūpamānalakṣaṇato vyākhyāsyāmaḥ|| 4||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी बोले—महाराज! भगवान्‌की मायाके गुणोंका इतना विस्तार है कि यदि कोई पुरुष देवताओंके समान आयु पा ले, तो भी मन या वाणीसे इसका अन्त नहीं पा सकता। इसलिये हम नाम, रूप, परिमाण और लक्षणोंके द्वारा मुख्य-मुख्य बातोंको लेकर ही इस भूमण्डलकी विशेषताओंका वर्णन करेंगे॥ ४॥✎ 455

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #455 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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