प्रत्येक वर्षमें मेरु आदि पर्वतोंसे निकली हुई और भी सैकड़ों नद-नदियाँ हैं॥ १०॥
अन्ये च नदा नद्यश्च वर्षे वर्षे सन्ति बहुशो मेर्वादिगिरिदुहितरः शतशः॥ १०॥
प्रत्येक वर्षमें मेरु आदि पर्वतोंसे निकली हुई और भी सैकड़ों नद-नदियाँ हैं॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.17.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 646) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/17/10/