वहाँसे गंगाजी करोड़ों विमानोंसे घिरे हुए आकाशमें होकर उतरती हैं और चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती मेरुके शिखरपर ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ४॥
ततोऽनेकसहस्रकोटिविमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दुमण्डलमावार्य ब्रह्मसदने निपतति॥ ४॥
वहाँसे गंगाजी करोड़ों विमानोंसे घिरे हुए आकाशमें होकर उतरती हैं और चन्द्रमण्डलको आप्लावित करती मेरुके शिखरपर ब्रह्मपुरीमें गिरती हैं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.17.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 645) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/17/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)