श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्‍चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदीपतिमेवाभिनिविशति सीतालकनन्दा चक्षुर्भद्रेति॥ ५॥ सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरेभ्योऽधोऽधः प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्‍ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति॥ ६॥

sītā tu brahmasadanātkesarācalādigiriśikharebhyo'dho'dhaḥ prasravantī gandhamādanamūrdhasu patitvāntareṇa bhadrāśvavarṣaṃ prācyāṃ diśi kṣārasamudramabhipraviśati|| 6||

अर्थ

इनमें सीता ब्रह्मपुरीसे गिरकर केसराचलोंके सर्वोच्च शिखरोंमें होकर नीचेकी ओर बहती गन्धमादनके शिखरोंपर गिरती है और भद्राश्‍ववर्षको प्लावित कर पूर्वकी ओर खारे समुद्रमें मिल जाती है॥ ६॥

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