श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथाष्टादशोऽध्यायः

भिन्‍न-भिन्‍न वर्षोंका वर्णन

श्रीशुक उवाच

तथा च भद्रश्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुलपतयः पुरुषा भद्राश्‍ववर्षे साक्षाद्भगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुं धर्ममयीं हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना संनिधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति॥ १॥

tathā ca bhadraśravā nāma dharmasutastatkulapatayaḥ puruṣā bhadrāśvavarṣe sākṣādbhagavato vāsudevasya priyāṃ tanuṃ dharmamayīṃ hayaśīrṣābhidhānāṃ parameṇa samādhinā saṃnidhāpyedamabhigṛṇanta upadhāvanti|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! भद्राश्‍ववर्षमें धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेवकी हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्तिको अत्यन्त समाधिनिष्ठाके द्वारा हृदयमें स्थापित कर इस मन्त्रका जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं॥ १॥

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