॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.27
यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा
हित्वा यतन्तोऽपि पृथक् समेत्य च।
पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः
सरीसृपं स्थाणु यदत्र दृश्यते॥ २७
yaṃ lokapālāḥ kila matsarajvarā
hitvā yatanto'pi pṛthak sametya ca|
pātuṃ na śekurdvipadaścatuṣpadaḥ
sarīsṛpaṃ sthāṇu yadatra dṛśyate|| 27
अर्थ
एक बार इन्द्रादि इन्द्रियाभिमानी देवताओंको प्राणस्वरूप आपसे डाह हुआ। तब आपके अलग हो जानेपर वे अलग-अलग अथवा आपसमें मिलकर भी मनुष्य, पशु, स्थावर-जंगम आदि जितने शरीर दिखायी देते हैं—उनमेंसे किसीकी बहुत यत्न करनेपर भी रक्षा नहीं कर सके॥ २७॥