श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.31

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यद्रूपमेतन्‍निजमाययार्पित-

मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम्।

संख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात्

तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे॥ ३१

yadrūpametannijamāyayārpita-

marthasvarūpaṃ bahurūparūpitam|

saṃkhyā na yasyāstyayathopalambhanāt

tasmai namaste'vyapadeśarūpiṇe|| 31

अर्थ

भगवन्! अनेक रूपोंमें प्रतीत होनेवाला यह दृश्यप्रपंच यद्यपि मिथ्या ही निश्‍चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह मायासे प्रकाशित होनेवाला आपका ही रूप है। ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है॥ ३१॥

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