॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.37
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-
र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि-
र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः॥ ३७
dravyakriyāhetvayaneśakartṛbhi-
rmāyāguṇairvastunirīkṣitātmane |
anvīkṣayāṅgātiśayātmabuddhibhi-
rnirastamāyākṛtaye namo namaḥ|| 37
अर्थ
विचार तथा यम-नियमादि योगांगोंके साधनसे जिनकी बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी है—वे महापुरुष द्रव्य (विषय), क्रिया (इन्द्रियोंके व्यापार), हेतु (इन्द्रियाधिष्ठाता देवता), अयन (शरीर), ईश, काल और कर्ता (अहंकार) आदि मायाके कार्योंको देखकर जिनके वास्तविक स्वरूपका निश्चय करते हैं ऐसे मायिक आकृतियोंसे रहित आपको बार-बार नमस्कार है॥ ३७॥