श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

वदन्ति विश्‍वं कवयः स्म नश्‍वरं

पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः।

तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया

सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम्॥ ४

vadanti viśvaṃ kavayaḥ sma naśvaraṃ

paśyanti cādhyātmavido vipaścitaḥ|

tathāpi muhyanti tavāja māyayā

suvismitaṃ kṛtyamajaṃ nato'smi tam|| 4

अर्थ

विद्वान् लोग जगत‍्को नश्‍वर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं; तो भी जन्मरहित प्रभो! आपकी मायासे लोग मोहित हो जाते हैं। आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४॥✎ 457

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #457 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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