श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.19.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

गायति चेदम्—

कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते

न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः।

द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते

तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे॥ १२

kartāsya sargādiṣu yo na badhyate

na hanyate dehagato'pi daihikaiḥ|

draṣṭurna dṛgyasya guṇairvidūṣyate

tasmai namo'saktaviviktasākṣiṇe|| 12

अर्थ

‘जो विश्‍वकी उत्पत्ति आदिमें उनके कर्ता होकर भी कर्तृत्वके अभिमानसे नहीं बँधते, शरीरमें रहते हुए भी उसके धर्म भूख-प्यास आदिके वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होनेपर भी जिनकी दृष्टि दृश्यके गुण-दोषोंसे दूषित नहीं होती—उन असंग एवं विशुद्ध साक्षिस्वरूप भगवान् नर-नारायणको नमस्कार है॥ १२॥

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