॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.19.30
जम्बूद्वीपस्य च राजन्नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति सगरात्मजैरश्वान्वेषण इमां महीं परितो निखनद्भिरुपकल्पितान्॥ २९॥ तद्यथा स्वर्णप्रस्थश्चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्दरहरिणः२ पाञ्चजन्यः सिंहलो लङ्केति॥ ३०॥ एवं तव भारतोत्तम जम्बूद्वीपवर्षविभागो यथोपदेशमुपवर्णित इति॥ ३१॥
tadyathā svarṇaprasthaścandraśukla āvartano ramaṇako mandarahariṇaḥ pāñcajanyaḥ siṃhalo laṅketi|| 30||
अर्थ
वे स्वर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दरहरिण, पांचजन्य, सिंहल और लंका हैं॥ ३०॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—मन्दहरिणो।