श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वाचं परं चरणपञ्जरतित्तिरीणां

ब्रह्मन्‍नरूपमुखरां शृणवाम तुभ्यम्।

लब्धा कदम्बरुचिरङ्कविटङ्कबिम्बे

यस्यामलातपरिधिः क्‍व च वल्कलं ते॥ १०

vācaṃ paraṃ caraṇapañjaratittirīṇāṃ

brahmannarūpamukharāṃ śṛṇavāma tubhyam|

labdhā kadambaruciraṅkaviṭaṅkabimbe

yasyāmalātaparidhiḥ kva ca valkalaṃ te|| 10

अर्थ

[नूपुरोंके शब्दकी ओर संकेत करके—] ब्रह्मन्! तुम्हारे चरणरूप पिंजड़ोंमें जो तीतर बन्द हैं, उनका शब्द तो सुनायी देता है; परन्तु रूप देखनेमें नहीं आता। [करधनीसहित पीली साड़ीमें अंगकी कान्तिकी उत्प्रेक्षा कर—] तुम्हारे नितम्बोंपर यह कदम्ब-कुसुमोंकी-सी आभा कहाँसे आ गयी? इनके ऊपर तो अंगारोंका मण्डल-सा भी दिखायी देता है। किन्तु तुम्हारा वल्कल-वस्त्र कहाँ है?॥ १०॥✎ 436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #436 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें