श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

इति ललनानुनयातिविशारदो ग्राम्यवैदग्ध्यया परिभाषया तां विबुधवधूं विबुधमतिरधिसभाजयामास॥ १७॥ सा च ततस्तस्य वीरयूथपतेर्बुद्धिशीलरूपवयःश्रियौदार्येण पराक्षिप्तमनास्तेन सहायुतायुतपरिवत्सरोपलक्षणं कालं जम्बूद्वीपपतिना भौमस्वर्गभोगान् बुभुजे॥ १८॥ तस्यामु ह वा आत्मजान् स राजवर आग्नीध्रो नाभिकिम्पुरुषहरिवर्षेलावृतरम्यकहिरण्मयकुरुभद्राश्‍वकेतुमालसंज्ञान्‍नव पुत्रानजनयत्॥ १९॥

sā ca tatastasya vīrayūthapaterbuddhiśīlarūpavayaḥśriyaudāryeṇa parākṣiptamanāstena sahāyutāyutaparivatsaropalakṣaṇaṃ kālaṃ jambūdvīpapatinā bhaumasvargabhogān bubhuje|| 18||

अर्थ

वीर-समाजमें अग्रगण्य आग्नीध्रकी बुद्धि, शील, रूप, अवस्था, लक्ष्मी और उदारतासे आकर्षित होकर वह उन जम्बूद्वीपाधिपतिके साथ कई हजार वर्षोंतक पृथ्वी और स्वर्गके भोग भोगती रही॥ १८॥

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