श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सा सूत्वाथ सुतान्‍नवानुवत्सरं गृह एवापहाय पूर्वचित्तिर्भूय एवाजं देवमुपतस्थे॥ २०॥ आग्नीध्रसुतास्ते मातुरनुग्रहादौत्पत्तिकेनैव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्मतुल्यनामानि यथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजुः॥ २१॥ आग्नीध्रो राजातृप्तः कामानामप्सरसमेवानुदिनमधिमन्यमानस्तस्याः सलोकतां श्रुतिभिरवारुन्ध यत्र पितरो मादयन्ते॥ २२॥ सम्परेते पितरि नव भ्रातरो मेरुदुहितॄर्मेरुदेवीं प्रतिरूपामुग्रदंष्ट्रीं लतां रम्यां श्यामां नारीं भद्रां देववीतिमितिसंज्ञा नवोदवहन्॥ २३॥✎ 1045

sā sūtvātha sutānnavānuvatsaraṃ gṛha evāpahāya pūrvacittirbhūya evājaṃ devamupatasthe|| 20||

अर्थ

इस प्रकार नौ वर्षमें प्रतिवर्ष एकके क्रमसे नौ पुत्र उत्पन्‍न कर पूर्वचित्ति उन्हें राजभवनमें ही छोड़कर फिर ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हो गयी॥ २०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1045 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेरुदुहितृर्मेरुदेवीं → मेरुदुहितॄर्मेरुदेवीं

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