‘मुनिवर्य! तुम कौन हो, इस पर्वतपर तुम क्या करना चाहते हो? तुम परमपुरुष श्रीनारायणकी कोई माया तो नहीं हो? [भौंहोंकी ओर संकेत करके—] सखे! तुमने ये बिना डोरीके दो धनुष क्यों धारण कर रखे हैं? क्या इनसे तुम्हारा कोई अपना प्रयोजन है अथवा इस संसारारण्यमें मुझ-जैसे मतवाले मृगोंका शिकार करना चाहते हो!॥ ७॥✎ 436
का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले
मायासि कापि भगवत्परदेवतायाः।
विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे
किं वा मृगान्मृगयसे विपिने प्रमत्तान्॥ ७
‘मुनिवर्य! तुम कौन हो, इस पर्वतपर तुम क्या करना चाहते हो? तुम परमपुरुष श्रीनारायणकी कोई माया तो नहीं हो? [भौंहोंकी ओर संकेत करके—] सखे! तुमने ये बिना डोरीके दो धनुष क्यों धारण कर रखे हैं? क्या इनसे तुम्हारा कोई अपना प्रयोजन है अथवा इस संसारारण्यमें मुझ-जैसे मतवाले मृगोंका शिकार करना चाहते हो!॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.2.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 584) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/2/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)