श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

एवं सुरोदाद्बहिस्तद‍्द्विगुणः समानेनावृतो घृतोदेन यथापूर्वः कुशद्वीपो यस्मिन् कुशस्तम्बो देवकृतस्तद‍्द्वीपाख्याकरो१ ज्वलन इवापरः स्वशष्परोचिषा दिशो विराजयति२॥ १३॥

evaṃ surodādbahistaddviguṇaḥ samānenāvṛto ghṛtodena yathāpūrvaḥ kuśadvīpo yasmin kuśastambo devakṛtastaddvīpākhyākaro jvalana ivāparaḥ svaśaṣparociṣā diśo virājayati|| 13||

अर्थ

इसी प्रकार मदिराके समुद्रसे आगे उससे दूने परिमाणवाला कुशद्वीप है। पूर्वोक्त द्वीपोंके समान यह भी अपने ही समान विस्तारवाले घृतके समुद्रसे घिरा हुआ है। इसमें भगवान्का रचा हुआ एक कुशोंका झाड़ है, उसीसे इस द्वीपका नाम निश्चित हुआ है। वह दूसरे अग्‍निदेवके समान अपनी कोमल शिखाओंकी कान्तिसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता रहता है॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—ख्यायनो ज्वलन।

    (मुद्रित पृष्ठ 663)
  2. २

    प्रा० पा०—विराजति।

    (मुद्रित पृष्ठ 663)

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