श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! इसके आगे लोकालोक नामका पर्वत है। यह पृथ्वीके सब ओर सूर्य आदिके द्वारा प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशोंके बीचमें उनका विभाग करनेके लिये स्थित है॥ ३४॥✎ 13571358
ततः परस्ताल्लोकालोकनामाचलो लोकालोकयोरन्तराले परित उपक्षिप्तः॥ ३४॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! इसके आगे लोकालोक नामका पर्वत है। यह पृथ्वीके सब ओर सूर्य आदिके द्वारा प्रकाशित और अप्रकाशित प्रदेशोंके बीचमें उनका विभाग करनेके लिये स्थित है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 667) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1357 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रवपर्यन्त → धु्रुवपर्यन्त
#1358 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): धु्रुवपर्यन्त → ध्रुवपर्यन्त