श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.42

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

आकल्पमेवं वेषं गत एष भगवानात्मयोगमायया विरचितविविधलोकयात्रागोपीथायेत्यर्थः॥ ४१॥ योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणं च व्याख्यातं यद्बहिर्लोकालोकाचलात्। ततः परस्ताद्योगेश्‍वरगतिं विशुद्धामुदाहरन्ति॥ ४२॥

yo'ntarvistāra etena hyalokaparimāṇaṃ ca vyākhyātaṃ yadbahirlokālokācalāt| tataḥ parastādyogeśvaragatiṃ viśuddhāmudāharanti|| 42||

अर्थ

लोकालोकके अन्तर्वर्ती भूभागका जितना विस्तार है, उसीसे उसके दूसरी ओरके अलोक प्रदेशके परिमाणकी भी व्याख्या समझ लेनी चाहिये। उसके आगे तो केवल योगेश्‍वरोंकी ही ठीक-ठीक गति हो सकती है॥ ४२॥

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