yo'ntarvistāra etena hyalokaparimāṇaṃ ca vyākhyātaṃ yadbahirlokālokācalāt| tataḥ parastādyogeśvaragatiṃ viśuddhāmudāharanti|| 42||
अर्थ
लोकालोकके अन्तर्वर्ती भूभागका जितना विस्तार है, उसीसे उसके दूसरी ओरके अलोक प्रदेशके परिमाणकी भी व्याख्या समझ लेनी चाहिये। उसके आगे तो केवल योगेश्वरोंकी ही ठीक-ठीक गति हो सकती है॥ ४२॥
योऽन्तर्विस्तार एतेन ह्यलोकपरिमाणं च व्याख्यातं यद्बहिर्लोकालोकाचलात्। ततः परस्ताद्योगेश्वरगतिं विशुद्धामुदाहरन्ति॥ ४२॥
लोकालोकके अन्तर्वर्ती भूभागका जितना विस्तार है, उसीसे उसके दूसरी ओरके अलोक प्रदेशके परिमाणकी भी व्याख्या समझ लेनी चाहिये। उसके आगे तो केवल योगेश्वरोंकी ही ठीक-ठीक गति हो सकती है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 668) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/20/42/