श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.20.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

प्लक्षादिषु पञ्चसु पुरुषाणामायुरिन्द्रियमोजः सहो बलं बुद्धिर्विक्रम इति च सर्वेषामौत्पत्तिकी सिद्धिरविशेषेण वर्तते॥ ६॥

plakṣādiṣu pañcasu puruṣāṇāmāyurindriyamojaḥ saho balaṃ buddhirvikrama iti ca sarveṣāmautpattikī siddhiraviśeṣeṇa vartate|| 6||

अर्थ

प्लक्ष आदि पाँच द्वीपोंमें सभी मनुष्योंको जन्मसे ही आयु, इन्द्रिय, मनोबल, इन्द्रियबल, शारीरिक बल, बुद्धि और पराक्रम समानरूपसे सिद्ध रहते हैं॥ ६॥✎ 468

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #468 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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