श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.21.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

यदा चैन्द्र्याः पुर्याः प्रचलते पञ्चदशघटिकाभिर्याम्यां सपादकोटिद्वयं योजनानां सार्धद्वादशलक्षाणि साधिकानि चोपयाति॥ १०॥ एवं ततो वारुणीं सौम्यामैन्द्रीं च पुनस्तथान्ये च ग्रहाः सोमादयो नक्षत्रैः सह ज्योतिश्‍चक्रे समभ्युद्यन्ति सह वा निम्लोचन्ति॥ ११॥ एवं मुहूर्तेन चतुस्त्रिंशल्लक्षयोजनान्यष्टशताधिकानि सौरो रथस्त्रयीमयोऽसौ चतसृषु परिवर्तते पुरीषु॥ १२॥

evaṃ muhūrtena catustriṃśallakṣayojanānyaṣṭaśatādhikāni sauro rathastrayīmayo'sau catasṛṣu parivartate purīṣu|| 12||

अर्थ

इस प्रकार भगवान् सूर्यका वेदमय रथ एक मुहूर्तमें चौंतीस लाख आठ सौ योजनके हिसाबसे चलता हुआ इन चारों पुरियोंमें घूमता रहता है॥ १२॥

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