॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.21.7
एवं नव कोटय एकपञ्चाशल्लक्षाणि योजनानां मानसोत्तरगिरिपरिवर्तनस्योपदिशन्ति तस्मिन्नैन्द्रीं पुरीं पूर्वस्मान्मेरोर्देवधानीं नाम दक्षिणतो याम्यां संयमनीं नाम पश्चाद्वारुणीं निम्लोचनीं नाम उत्तरतः सौम्यां विभावरीं नाम तासूदयमध्याह्नास्तमयनिशीथानीति भूतानां प्रवृत्तिनिवृत्तिनिमित्तानि समयविशेषेण मेरोश्चतुर्दिशम्॥ ७॥ तत्रत्यानां दिवसमध्यङ्गत एव सदाऽऽदित्यस्तपति सव्येनाचलं दक्षिणेन करोति॥ ८॥
evaṃ nava koṭaya ekapañcāśallakṣāṇi yojanānāṃ mānasottaragiriparivartanasyopadiśanti tasminnaindrīṃ purīṃ pūrvasmānmerordevadhānīṃ nāma dakṣiṇato yāmyāṃ saṃyamanīṃ nāma paścādvāruṇīṃ nimlocanīṃ nāma uttarataḥ saumyāṃ vibhāvarīṃ nāma tāsūdayamadhyāhnāstamayaniśīthānīti bhūtānāṃ pravṛttinivṛttinimittāni samayaviśeṣeṇa meroścaturdiśam|| 7||
अर्थ
इस प्रकार पण्डितजन मानसोत्तर पर्वतपर सूर्यकी परिक्रमाका मार्ग नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन बताते हैं। उस पर्वतपर मेरुके पूर्वकी ओर इन्द्रकी देवधानी, दक्षिणमें यमराजकी संयमनी, पश्चिममें वरुणकी निम्लोचनी और उत्तरमें चन्द्रमाकी विभावरी नामकी पुरियाँ हैं। इन पुरियोंमें मेरुके चारों ओर समय-समयपर सूर्योदय, मध्याह्न, सायंकाल और अर्धरात्रि होते रहते हैं; इन्हींके कारण सम्पूर्ण जीवोंकी प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है॥ ७॥✎ 1359