श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

य एष षोडशकलः पुरुषो भगवान्मनोमयोऽन्‍नमयोऽमृतमयो देवपितृमनुष्यभूतपशुपक्षिसरीसृपवीरुधां प्राणाप्यायनशीलत्वात्सर्वमय इति वर्णयन्ति॥ १०॥

ya eṣa ṣoḍaśakalaḥ puruṣo bhagavānmanomayo'nnamayo'mṛtamayo devapitṛmanuṣyabhūtapaśupakṣisarīsṛpavīrudhāṃ prāṇāpyāyanaśīlatvātsarvamaya iti varṇayanti|| 10||

अर्थ

ये जो सोलह कलाओंसे युक्त मनोमय, अन्‍नमय, अमृतमय पुरुषस्वरूप भगवान् चन्द्रमा हैं—ये ही देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और वृक्षादि समस्त प्राणियोंके प्राणोंका पोषण करते हैं; इसलिये इन्हें ‘सर्वमय’ कहते हैं॥ १०॥

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