श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत उपरिष्टात्त्रिलक्षयोजनतो नक्षत्राणि मेरुं दक्षिणेनैव कालायन ईश्‍वरयोजितानि सहाभिजिताष्टाविंशतिः॥ ११॥ तत उपरिष्टादुशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः पश्चात्सहैव वार्कस्य शैघ्र्यमान्द्यसाम्याभिर्गतिभिरर्कवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल एव प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्टम्भग्रहोपशमनः॥ १२॥

tata upariṣṭāduśanā dvilakṣayojanata upalabhyate purataḥ paścātsahaiva vārkasya śaighryamāndyasāmyābhirgatibhirarkavaccarati lokānāṃ nityadānukūla eva prāyeṇa varṣayaṃścāreṇānumīyate sa vṛṣṭiviṣṭambhagrahopaśamanaḥ|| 12||

अर्थ

इनसे दो लाख योजन ऊपर शुक्र दिखायी देता है। यह सूर्यकी शीघ्र, मन्द और समान गतियोंके अनुसार उन्हींके समान कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ-साथ रहकर चलता है। यह वर्षा करनेवाला ग्रह है, इसलिये लोकोंको प्रायः सर्वदा ही अनुकूल रहता है। इसकी गतिसे ऐसा अनुमान होता है कि यह वर्षा रोकनेवाले ग्रहोंको शान्त कर देता है॥ १२॥✎ 470

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #470 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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