श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.23.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

शिशुमारचक्रका वर्णन

श्रीशुक उवाच

अथ तस्मात्परतस्त्रयोदशलक्षयोजनान्तरतो यत्तद्विष्णोः परमं पदमभिवदन्ति यत्र ह महाभागवतो ध्रुव औत्तानपादिरग्‍निनेन्द्रेण प्रजापतिना कश्यपेन धर्मेण च समकालयुग्भिः सबहुमानं दक्षिणतः क्रियमाण इदानीमपि कल्पजीविनामाजीव्य उपास्ते तस्येहानुभाव उपवर्णितः॥ १॥ स हि सर्वेषां ज्योतिर्गणानां ग्रहनक्षत्रादीनामनिमिषेणाव्यक्तरंहसाभगवता कालेन भ्राम्यमाणानां स्थाणुरिवावष्टम्भ ईश्‍वरेण विहितः शश्‍वदवभासते॥ २॥✎ 952

sa hi sarveṣāṃ jyotirgaṇānāṃ grahanakṣatrādīnāmanimiṣeṇāvyaktaraṃhasābhagavatā kālena bhrāmyamāṇānāṃ sthāṇurivāvaṣṭambha īśvareṇa vihitaḥ śaśvadavabhāsate|| 2||

अर्थ

सदा जागते रहनेवाले अव्यक्तगति भगवान् कालके द्वारा जो ग्रह-नक्षत्रादि ज्योतिर्गण निरन्तर घुमाये जाते हैं, भगवान्‌ने ध्रुवलोकको ही उन सबके आधारस्तम्भरूपसे नियुक्त किया है। अतः यह एक ही स्थानमें रहकर सदा प्रकाशित होता है॥ २॥✎ 471

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #471 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #952 शब्दोंके बीचका स्थान: उपवर्णित:॥१॥ → उपवर्णितः॥ १॥

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