जिनके सुने-सुनाये नामका कोई पीड़ित अथवा पतित पुरुष अकस्मात् अथवा हँसीमें भी उच्चारण कर लेता है तो वह पुरुष दूसरे मनुष्योंके भी सारे पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है—ऐसे शेषभगवान्को छोड़कर मुमुक्षु पुरुष और किसका आश्रय ले सकता है?॥ ११॥✎ 485486
यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-
दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा।
हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं
कं शेषाद्भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः॥ ११
जिनके सुने-सुनाये नामका कोई पीड़ित अथवा पतित पुरुष अकस्मात् अथवा हँसीमें भी उच्चारण कर लेता है तो वह पुरुष दूसरे मनुष्योंके भी सारे पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है—ऐसे शेषभगवान्को छोड़कर मुमुक्षु पुरुष और किसका आश्रय ले सकता है?॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.25.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 685) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/25/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्को