श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते॥ ६॥

sa eva bhagavānananto'nantaguṇārṇava ādideva upasaṃhṛtāmarṣaroṣavego lokānāṃ svastaya āste|| 6||

अर्थ

वे अनन्त गुणोंके सागर आदिदेव भगवान् अनन्त अपने अमर्ष (असहनशीलता) और रोषके वेगको रोके हुए वहाँ समस्त लोकोंके कल्याणके लिये विराजमान हैं॥ ६॥

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