श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

य एष एवमनुश्रुतो१ ध्यायमानो मुमुक्षूणामनादिकालकर्मवा२सनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्रन्थिं सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान्३ भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह तुम्बुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास॥ ८॥

ya eṣa evamanuśruto dhyāyamāno mumukṣūṇāmanādikālakarmavāsanāgrathitamavidyāmayaṃ hṛdayagranthiṃ sattvarajastamomayamantarhṛdayaṃ gata āśu nirbhinatti tasyānubhāvān bhagavān svāyambhuvo nāradaḥ saha tumburuṇā sabhāyāṃ brahmaṇaḥ saṃślokayāmāsa|| 8||

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् अनन्त माहात्म्य-श्रवण और ध्यान करनेसे मुमुक्षुओंके हृदयमें आविर्भूत होकर उनकी अनादिकालीन कर्मवासनाओंसे ग्रथित सत्त्व, रज और तमोगुणात्मक अविद्यामयी हृदयग्रन्थिको तत्काल काट डालते हैं। उनके गुणोंका एक बार ब्रह्माजीके पुत्र भगवान् नारदने तुम्बुरु गन्धर्वके साथ ब्रह्माजीकी सभामें इस प्रकार गान किया था॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मनुश्रुतोऽभिध्याय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 684)
  2. २

    प्रा० पा०—कर्मणां वा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 684)
  3. ३

    प्रा० पा०—भावमुद्वहन् भग०।

    (मुद्रित पृष्ठ 684)

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