जो क्रूर मनुष्य इस लोकमें अपना पेट पालनेके लिये जीवित पशु या पक्षियोंको राँधता है, उस हृदयहीन, राक्षसोंसे भी गये-बीते पुरुषको यमदूत कुम्भीपाक नरकमें ले जाकर खौलते हुए तैलमें राँधते हैं॥ १३॥
यस्त्विह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचरा कुम्भीपाके तप्ततैलेउपरन्धयन्ति॥ १३॥
जो क्रूर मनुष्य इस लोकमें अपना पेट पालनेके लिये जीवित पशु या पक्षियोंको राँधता है, उस हृदयहीन, राक्षसोंसे भी गये-बीते पुरुषको यमदूत कुम्भीपाक नरकमें ले जाकर खौलते हुए तैलमें राँधते हैं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.26.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 688) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/26/13/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—मये खले।
(मुद्रित पृष्ठ 688)
३
प्रा० पा०—शेतेऽवतिष्ठति।
(मुद्रित पृष्ठ 688)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1066 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दह्यमानान्त-र्बहि:शरीर → दह्यमानान्तर्बहिःशरीर