श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.26.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

यस्त्विह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचरा कुम्भीपाके तप्ततैलेउपरन्धयन्ति॥ १३॥ यस्त्विह पितृविप्रब्रह्मध्रुक् स कालसूत्रसंज्ञके नरके अयुतयोजनपरिमण्डले ताम्रमये२ तप्तखले उपर्यधस्तादग्न्यर्काभ्यामतितप्यमानेऽभिनिवेशितः क्षुत्पिपासाभ्यां च दह्यमानान्तर्बहिःशरीर आस्ते शेते३ चेष्टतेऽवतिष्ठति परिधावति च यावन्ति पशुरोमाणि तावद्वर्षसहस्राणि॥ १४॥✎ 1066

yastviha vā ugraḥ paśūn pakṣiṇo vā prāṇata uparandhayati tamapakaruṇaṃ puruṣādairapi vigarhitamamutra yamānucarā kumbhīpāke taptataileuparandhayanti|| 13||

अर्थ

जो क्रूर मनुष्य इस लोकमें अपना पेट पालनेके लिये जीवित पशु या पक्षियोंको राँधता है, उस हृदयहीन, राक्षसोंसे भी गये-बीते पुरुषको यमदूत कुम्भीपाक नरकमें ले जाकर खौलते हुए तैलमें राँधते हैं॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—मये खले।

    (मुद्रित पृष्ठ 688)
  2. ३

    प्रा० पा०—शेतेऽवतिष्ठति।

    (मुद्रित पृष्ठ 688)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1066 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): दह्यमानान्त-र्बहि:शरीर → दह्यमानान्तर्बहिःशरीर

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