श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्‍वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि भवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमिवधनःफलीकरणम्॥ १३॥ को वा इह तेऽपराजितोऽपराजितया माययानवसितपदव्यानावृतमतिर्विषयविषरयानावृतप्रकृतिरनुपासितमहच्चरणः॥ १४॥ यदु ह वाव तव पुनरदभ्रकर्तरिह समाहूतस्तत्रार्थधियां मन्दानां नस्तद्यद्देवहेलनं देवदेवार्हसि साम्येन सर्वान् प्रतिवोढुमविदुषाम्॥ १५॥

kiñcāyaṃ rājarṣirapatyakāmaḥ prajāṃ bhavādṛśīmāśāsāna īśvaramāśiṣāṃ svargāpavargayorapi bhavantamupadhāvati prajāyāmarthapratyayo dhanadamivadhanaḥphalīkaraṇam|| 13||

अर्थ

इसके सिवा, कहनेयोग्य न होनेपर भी एक प्रार्थना और है। आप साक्षात् परमेश्‍वर हैं; स्वर्ग-अपवर्ग आदि ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे आप न दे सकें। तथापि जैसे कोई कंगाल किसी धन लुटानेवाले परम उदार पुरुषके पास पहुँचकर भी उससे भूसा ही माँगे, उसी प्रकार हमारे यजमान ये राजर्षि नाभि सन्तानको ही परम पुरुषार्थ मानकर आपके ही समान पुत्र पानेके लिये आपकी आराधना कर रहे हैं॥ १३॥

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