इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता॥ १८॥
तत आग्नीध्रीयेंऽशकलयावतरिष्यामि आत्मतुल्यमनुपलभमानः॥ १८॥
इसलिये मैं स्वयं ही अपनी अंशकलासे आग्नीध्रनन्दन नाभिके यहाँ अवतार लूँगा, क्योंकि अपने समान मुझे कोई और दिखायी नहीं देता॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.3.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 590) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/3/18/