श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अथानयापि न भवत इज्ययोरुभारभरया समुचितमर्थमिहोपलभामहे॥ ७॥

athānayāpi na bhavata ijyayorubhārabharayā samucitamarthamihopalabhāmahe|| 7||

अर्थ

हमें तो अनुरागके सिवा इस द्रव्य-कालादि अनेकों अंगोंवाले यज्ञसे भी आपका कोई प्रयोजन नहीं दिखलायी देता;॥ ७॥

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