॥ श्रीहरिः ॥
यद्यच्छीर्षण्याचरितं तत्तदनुवर्तते लोकः॥ १५॥ यद्यपि स्वविदितं सकलधर्मं५ ब्राह्मं गुह्यं ब्राह्मणैर्दर्शितमार्गेण सामादिभिरुपायैर्जनतामनुशशास॥ १६॥ द्रव्यदेशकालवयःश्रद्धर्त्विग्विविधोद्देशोपचितैः सर्वैरपि क्रतुभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज॥ १७॥
yadyacchīrṣaṇyācaritaṃ tattadanuvartate lokaḥ|| 15||
अर्थ
महापुरुष जैसा-जैसा आचरण करते हैं, दूसरे लोग उसीका अनुकरण करने लगते हैं॥ १५॥
यद्यच्छीर्षण्याचरितं तत्तदनुवर्तते लोकः॥ १५॥
महापुरुष जैसा-जैसा आचरण करते हैं, दूसरे लोग उसीका अनुकरण करने लगते हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.4.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 592) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/4/15/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—सकलधर्माधर्मं ब्राह्मं।
(मुद्रित पृष्ठ 592)