श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भगवतर्षभेण परिरक्ष्यमाण एतस्मिन् वर्षे न कश्‍चन पुरुषो वाञ्छत्यविद्यमानमिवात्मनोऽन्यस्मात्कथञ्चन किमपि कर्हिचिदवेक्षते भर्तर्यनुसवनं विजृम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण॥ १८॥ स कदाचिदटमानो भगवानृषभो ब्रह्मावर्तगतो ब्रह्मर्षिप्रवरसभायां प्रजानां निशामयन्तीनामात्मजानवहितात्मनः प्रश्रयप्रणयभरसुयन्त्रितानप्युपशिक्षयन्‍निति होवाच॥ १९॥

sa kadācidaṭamāno bhagavānṛṣabho brahmāvartagato brahmarṣipravarasabhāyāṃ prajānāṃ niśāmayantīnāmātmajānavahitātmanaḥ praśrayapraṇayabharasuyantritānapyupaśikṣayanniti hovāca|| 19||

अर्थ

एक बार भगवान् ऋषभदेव घूमते-घूमते ब्रह्मावर्त देशमें पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियोंकी सभामें उन्होंने प्रजाके सामने ही अपने समाहितचित्त तथा विनय और प्रेमके भारसे सुसंयत पुत्रोंको शिक्षा देनेके लिये इस प्रकार कहा॥ १९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥

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