श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ब्रह्मण्योऽन्यः कुतो नाभेर्विप्रा मङ्गलपूजिताः।

यस्य बर्हिषि यज्ञेशं दर्शयामासुरोजसा॥ ७

brahmaṇyo'nyaḥ kuto nābherviprā maṅgalapūjitāḥ|

yasya barhiṣi yajñeśaṃ darśayāmāsurojasā|| 7

अर्थ

महाराज नाभिके समान ब्राह्मणभक्त भी कौन हो सकता है—जिनकी दक्षिणादिसे सन्तुष्ट हुए ब्राह्मणोंने अपने मन्त्रबलसे उन्हें यज्ञशालामें साक्षात् श्रीविष्णुभगवान्‌के दर्शन करा दिये॥ ७॥

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